इस चित्र विचित्र विश्व और विश्व के क्रिया और क्रिया कलाप को देख, कर मानव मस्तिष्क आश्चर्यचकित हो जाता है और वह यह सोचने के लिये विवश हो जाता है कि सुप्रतिष्ठित एवं सुव्यवस्थित इस संसार का कर्ता कौन है इस प्रकार अनवरत चिन्तन का नाम ही दर्शन है , मनुष्यो के अथक प्रयत्नो का

तथा चिन्तनो का एकत्रित रुप ही दर्शन है । दर्शन शब्द दॄशिर प्रेक्षणे धातु से बना ल्युट प्रत्यय करके बना है । दृश्यते अनेन इति दर्शनम । दर्शन रुपि विचार धारा का मूल स्रोत वेद है ।

नारद भक्ति सूत्र

वैदिक साहित्य मे ज्ञान कर्म और भक्ति तीन मार्ग बताया गया है जिसके माध्यम से उस सर्वतन्त्र स्वतन्त्र परम तत्व को प्राप्त करने का विचार किया गया है । नारद भक्ति सूत्र ज्ञान मार्ग से सम्बन्धित वेदान्त दर्शन है , जिसमे माया के बन्धन से मुक्त होकर ब्रह्म रुपी ज्ञान से मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताया गया है कर्म मार्ग मे विभीन्न प्राकार के कर्मकाण्ड द्वारा स्वगादि को प्राप्त करना बताया गया है सांख्य , योग , न्याय वैशेषिक दर्शनादि तत्व ज्ञान दुःखो के निवृति के लिये प्रकृति पुरुषादि के ज्ञान से मोक्ष प्रप्ति पर विचार करते है भक्ति मार्ग मे उस परम तत्व को प्राप्त करने के लिये व्यक्ति को ही एक मात्र साधन माना गया है । भक्ति मार्ग मे तीन आचर्यो द्वारा भक्ति को अपने ग्रन्थ मे परिभाषित किया है , जिसने देवर्षि नारद द्वारा विरचित नारद भक्ति सुत्र तथा शाण्डील्य मुनि द्वारा रचित तथा ॠषि अंगिरा द्वारा रचित भक्ति सुत्र है , नारद भक्ति सुत्र तथा शाण्डिल्य भक्ति सुत्र मुख्यरुप से है ।

भक्ति सूत्र

भक्ति शब्द भज सेवायम् धातु से सेवा अर्थ मे या भक्ति अर्थ मे है इसका अर्थ इश्वर के प्रति आसक्ति है नारद भक्ति सूत्र मे परम तत्व कि प्राप्ति मे भक्ति को हि प्रधानता दी है जो साधन ओर सिध्दि स्वयं है । भक्त भगवान ओर भक्ति मे परस्पर कोइ भेद नही रह जाता है यद्यपि भक्ति के क्षेत्र मे शाण्डिलय भक्ति भी प्रसिध्द है । परन्तु नारद भक्ति सुत्र ईश्वर के प्राप्ति मे भक्ति को ही साधन मानने के कारण अत्यन्त सरल है ।देवर्षि नारद ब्राह्मा जी के मानस पुत्र कहे जाते है , नारद शब्द नारं ज्ञानं ददाति इति नारदः , नरो के ज्ञान के देने वाले को नारद कहते है अतः उनका नाम नारद है । सनातन धर्म का शायद हि कोई इसा ग्रंथ होगा जिसमे देवर्षि नारद का नाम न आता हो , नारद जी ने सर्व प्रथम नारद स्मृति कि रचना कि जिसमे उन्होने कर्मकाण्ड को बताया है तत्पश्चात नारद पंचरात्र की रचना कि जिसमे कर्म ओर उपासना दोनो को प्रतिपादित किया है तथा अन्त मे परम तत्व कि प्राप्ति मे केवल भक्ति को हि मुख्य बताया है जिसके निरुपण के लिये नारद भक्ति सूत्र है

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